आम अमेरिकियों को यह चिंता सता रही है कि अमेरिका में आहूत मध्यावधि चुनाव एक डरावना सच न साबित हो जाए। जो बात परेशान करने वाली है, वह यह कि अमेरिकी महंगाई का असर इस बार कहीं भारत पर न पड़े। यह सच है कि 2008 की अमेरिकी मंदी का असर हमारे देश पर वित्तीय बाजारों, निर्यात और विदेशी निवेश के जरिए पड़ा था। अमेरिका में महंगाई बढ़ने या फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने का सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
इस बार एक और खतरनाक काम इसी हफ्ते अमेरिकी संसद में हुआ है। शुल्क लगाने के लिए एक ऐसे विधेयक को स्वीकृति दी गई, जिससे ट्रंप की शक्तियां असीमित होने जा रही हैं। भारत के लिहाज से देखें, तो यह विधेयक अत्यंत घातक नतीजे देने वाला साबित हो सकता है।
अधिकार का दायरा
गौरतलब है कि अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) ने बुधवार, 16 सितंबर 2026 को दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में नामित रूस और ईरान प्रतिबंध विधेयक को अंतिम मंजूरी दे दी। सीनेटर ग्राहम का इसी वर्ष जुलाई में अचानक निधन हो गया था। यह विधेयक पहली बार अप्रैल 2025 में पेश किया गया था। अगस्त 2026 में अमेरिकी सीनेट ने इसे 86-11 के भारी बहुमत से पास किया था। एक साल से ज्यादा समय तक चली जटिल बातचीत के बाद ग्राहम ने वाइट हाउस को इसके लिए राजी करने में अहम भूमिका निभाई। अपनी मौत से ठीक एक दिन पहले वे सार्वजनिक रूप से यूक्रेन में देखे गए थे। दौरे के दौरान कीव की सड़कों पर टैंकों के सामने खड़े होकर उन्होंने घोषणा की कि ट्रंप इस विधेयक का समर्थन करेंगे।
सीनेट से पहले ही पारित हो चुके इस ऐतिहासिक विधेयक पर ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद इसका नाम अब ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ हो गया है। प्रतिनिधि सभा में इस विधेयक को 262/159 के बहुमत से पारित किया गया। इस कानून के जरिए अमेरिका दरअसल रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों तथा प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रूसी तेल टैंकरों के गुप्त बेड़े ‘शैडो फ्लीट’ को निश्चित रूप से निशाना बनाएगा।
इस विधेयक की सबसे बड़ी बात यह है कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर सौ फीसद तक सीमा शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार देता है, जो रूस से कच्चा तेल या गैस खरीदना जारी रख रहे हैं। रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदने के कारण भारत और चीन इसके मुख्य दायरे में आ सकते हैं।
प्रतिक्रिया की जड़
प्रतिनिधि सभा में जो कुछ हुआ, उसे देखकर साफ लगता है कि ज्यादातर रिपब्लिकन सांसद इस विधेयक का समर्थन करते हैं, लेकिन बातचीत की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, हाल के दिनों में लगभग एक दर्जन रिपब्लिकन सांसदों ने पार्टी नेताओं से विधेयक में शामिल शुल्क से जुड़ी नई शक्तियों को हटाने के लिए पैरवी की थी और एक तरह से इसके लिए अभियान चलाया था। उन्हें डर था कि नवंबर 2026 में मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले कीमतें और बढ़ सकती हैं। नवंबर में रिपब्लिकन की जीत पर हर अमेरिकी को 5,000 डॉलर का चेक देने का ट्रंप का बड़ा मध्यावधि प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है, क्योंकि कैपिटल हिल के सत्तारूढ़ रिपब्लिकन नेताओं ने इस विचार से खुद को दूर कर लिया है।
इस कानून के तहत मिली नई शुल्क नीति लागू करने की शक्तियों का इस्तेमाल करके ट्रंप प्रशासन रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों, जिनमें चीन और भारत भी शामिल हैं, पर सौ फीसद तक का शुल्क (लेवी) लगा सकता है। आलोचकों का कहना है कि इससे अर्थव्यवस्था को जबरदस्त झटका लग सकता है। मगर ट्रंप क्या ये सब ब्रिक्स सम्मेलन की सफलता देखकर अपनी खुन्नस निकाल रहे हैं?
रणनीतिक पहल
दिल्ली में संपन्न हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और नई दिल्ली घोषणापत्र में अमेरिकी प्रतिबंधों, शुल्क की धमकियों और वैश्विक स्तर पर डॉलर के वर्चस्व को लेकर चिंता जताई गई थी। उसके बाद से ही अमेरिकी रणनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई। बताया गया कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर अंतिम शुल्क दर तय करेंगे, लेकिन इससे सार्वजनिक रूप से बात करने वाले कुछ डेमोक्रेट सांसद और निजी तौर पर चिंता जताने वाले रिपब्लिकन सांसदों की चिंताएं दूर नहीं हुई हैं। उनका मानना है कि इस संभावित सुरक्षा उपाय के बावजूद यह कानून आखिरकार शुल्क के मामले में ट्रंप को ही ताकतवर बनाएगा। ट्रंप के ताकतवर होने का मतलब है, वे अपनी मनमानी करेंगे।
हालांकि कानून का समर्थन करने वाले दोनों पक्षों का तर्क है कि शुल्क से जुड़ी शक्ति सीमित और सोच-समझकर तय की गई है और यह डर बेबुनियाद है कि राष्ट्रपति को व्यापार के मामलों में ज्यादा ताकत मिल जाएगी। बहरहाल, रिपब्लिकन पार्टी के ज्यादातर लोग इस ‘पैकेज’ का समर्थन करने के लिए उत्सुक थे, जिसमें राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत रूसी सरकार के बड़े अधिकारियों, रूसी उद्योगपतियों, सरकारी कंपनियों और रूस के रक्षा उद्योग को समर्थन देने वाली विदेशी कंपनियों पर अनिवार्य प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।
प्राथमिकता का तकाजा
डोनाल्ड ट्रंप संयुक्त राज्य अमेरिका के सैंतालीसवें राष्ट्रपति हैं। यह उनका दूसरा और अंतिम कार्यकाल है। रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप के नाम पर अब और अधिक दांव नहीं खेलना चाहती। अमेरिकी राजनीति मुख्य रूप से दो बड़ी पार्टियों- वर्तमान में प्रतिपक्षी डेमोक्रेट और सत्तारूढ़ रिपब्लिकन के बीच बंटी हुई है। ट्रंप का इन दोनों पार्टियों के साथ एक दिलचस्प इतिहास रहा है। राजनीति में आने से पहले वे एक समय (2001 से 2009 के बीच) एक पंजीकृत डेमोक्रेटिक सदस्य भी रह चुके हैं। हालांकि बाद में उन्होंने पाला बदला और रिपब्लिकन पार्टी में शामिल होकर इसकी पूरी विचारधारा को अपने ‘एमएजीए’ (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) आंदोलन के तहत नया रूप दे दिया।
अब सवाल है कि भारत को किस रणनीति पर चलने की जरूरत है? बीते वर्ष अगस्त में अमेरिकी शुल्क-नीति के दबाव के बरक्स इस बार भारत ने शुरुआती दौर में ही स्पष्ट कर दिया है कि उसके लिए अपने आम नागरिकों की ऊर्जा जरूरतें और राष्ट्रीय हित का सवाल प्राथमिक है और वह इसे सुनिश्चित करेगा। यों भी, भारत की 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है। जाहिर है, भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से तेल आयात जारी रखना चाहिए। हमें वैकल्पिक ऊर्जा की ओर ध्यान देना होगा। अमेरिका से किसी भी अनुचित या असमान व्यापार समझौते के दबाव में आकर अपने वाणिज्यिक हितों का समझौता नहीं करना चाहिए।

