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    Home»लेख-आलेख»‘दिमागी नक्सली’ शब्द पर हंगामा क्यों…
    लेख-आलेख

    ‘दिमागी नक्सली’ शब्द पर हंगामा क्यों…

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inAugust 17, 2026
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    कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री पहले अपने विरोधियों को अर्बन नक्सल कहते थे और अब दिमागी नक्सल कह रहे हैं। उन्होंने यहभी कहा कि जिन मुद्दों को लेकर सरकार के विरोधियों को पहले अर्बन नक्सल या अब दिमागी नक्सल कहा जाता है, उनमें से कुछ मांगों या विचारोंको सरकार बाद में स्वीकार करती रही है। सोशल मीडिया पर जाएंगे तो भारी संख्या में लोग स्वयं को दिमागी नक्सली और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं। यह स्थिति चिंता पैदा करने वाली है किंतु आश्चर्यजनकनहीं।

    पहले यह देखें कि आखिर प्रधानमंत्री ने कहा क्या? प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमें सावधान रहने की जरूरत है। हथियारबंद नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। समाज को गलत राह पर ले जाने के लिए तरह-तरह के काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘ऐसे लोग हिंसा, अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन्हें युवाओं को भटकाने से बचाना होगा और इन्हें आइसोलेट करना होगा और विकसित राष्ट्र बनाने की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा।’’

    यह भी सच है कि अब एक अन्य किस्म के झूठ द्वारा कृत्रिम असंतोष और हिंसक अराजकता पैदा करने की कोशिश लगातार चल रही है। उदाहरण के लिए हाल के कुछ आंदोलन देखिए। सरकार ने पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक रूप से उत्पीड़ित गैर मुसलमानों के लिए नागरिकता कानून में संशोधन किया तो उसके विरुद्ध दिल्ली के शाहीनबाग में धरना शुरू हुआ। देखते-देखते देश और दुनिया में इसका दुष्प्रचार हुआ। धरनास्थल सड़क पर स्थायी निर्माण कर दिए गए। अगर कोरोना संकट नहीं आता तो इनको हटाना मुश्किल था। इसके कारण हिंसा हुई और अंतत: दिल्ली में दंगे तक हो गए। मुसलमानों और दूसरे तत्वों को भड़काया गया कि आपकी नागरिकता चली जाएगी। आज तक किसी की नागरिकता नहीं गई। साफ है कि इसके पीछे देश में हिंसक अराजकता ही पैदा करने की कोशिश थी।

    कृषि कानून विरोधी आंदोलन को देख लीजिए। उस आंदोलन में वास्तविक किसान भी थे लेकिन अराजक तत्व हावी रहे। दिल्ली को चारों ओर से घेरा गया। 26 जनवरी के दिन दिल्ली की सड़कों पर ट्रैक्टर ऐसे दौड़ रहे थे मानो हथियारबंद गाडिय़ां हों। भारी संख्या में लोगों ने लाल किले पर चढ़कर पुलिस वालों को धक्के देकर नीचे गिराया। काफी संख्या में हमारे जवान घायल भी हुए। एक किसान नेता ने बाद में कहा कि थोड़ी गलती हो गई, संसद तक पहुंच जाते तो बंगलादेश उसी दिन दोहरा देते।

    आप इस प्रकार के विचार और व्यवहार को क्या कहेंगे? अभी हाल में कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर से दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन हुआ। वहां नारे क्या लग रहे थे? कोई आजादी के नारे लगा रहा था, कोई 370 हटाने का विरोध, कोई शरजिल इमाम के चिकन नैक को काटने का समर्थन कर रहा था तो कोई मेरा लिंग मेरा अधिकार तो कोई समलैंगिकता को लेकर झंडा उठाए हुए था। जिस तरह प्रधानमंत्री के लिए शब्दों का इस्तेमाल हुआ और जैसे पोस्टर दिखाए गए, उनसे शर्म से सिर झुक जाए। उस आंदोलन में ऐसे तत्व शामिल थे, जो चेहरा ढंककर पत्थरबाजी कर रहे थे, पुलिस की गाडिय़ां तोड़ रहे थे, पुलिस से मुठभेड़ कर रहे थे और अंतत: संसद मार्च के नाम पर संसद की दीवार तक पहुंच गए।

    यह सब छद्म रूप में माओवाद और नक्सलवाद ही है। आखिर मल्लिकार्जुन खरगे जैसे कांग्रेस अध्यक्ष और उनके पुत्र अगर सनातन का विरोध करते हैं तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए? विडंबना देखिए कि आजकल ये सब कहते हैं कि हम भी हिंदू हैं और हिंदू धर्म पर हमारा भी विश्वास है और उस रूप में बातें की जाती हैं। राहुल गांधी ने तो फैजाबाद लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद कह दिया कि हमने अयोध्या आंदोलन को ही हरा दिया। सनातन को डेंगू, मलेरिया, विषाणु कहने वाले के विरुद्ध एक शब्द नहीं। कुछ कर्मचारियों द्वारा श्रीराम मंदिर चढ़ावे की चोरी जैसे निकृष्ट अपराध और पाप को ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे श्रीराम मंदिर के लिए काम करने वाली पार्टियों और संगठनों ने लूट मचाई है। ये सब विचार लोगों में केवल गुस्सा और अतिवादी भाव ही पैदा नहीं करते, मंदिर और धर्म में आस्था पर भी चोट पहुंचाते हैं।

    आश्चर्य की बात है कि अपने कार्यकाल में नक्सलवादियों द्वारा सुरक्षा बलों की बारूदी सुरंग से हत्या या फिरछत्तीसगढ़ में कांग्रेस के अधिकतम वरिष्ठ नेताओं को एक ही दिन में समाप्त करने जैसी घटनाओं के बाद जिस नक्सलवाद को चिदम्बरम ने आतंकवाद की संज्ञा देकर उसे समूल नाश करने का संकल्प लिया, वे आज ऐसी बातें बोल रहे हैं। विरोधी प्रधानमंत्री को कुछ भी कहें लेकिन उनकी चेतावनी सच है कि मानसिक नक्सलियों से भारत को हर दृष्टि से सुरक्षित बनाने के लिए सतर्क और सचेत रहना होगा। हमें विश्व शक्ति बनना है तो इन तत्वों को समाज की मुख्यधारा से बाहर करना ही होगा। यह संघर्ष ज्यादा कठिन है।-अवधेश कुमार 

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