युद्धविराम और समझौते की कथित बातचीत के बावजूद राष्ट्रपति टं्रप ने हुंकार भरी है कि ईरान 21 दिन में खत्म हो जाएगा। वह सब कुछ तबाह कर देंगे। फिर टं्रप युद्धविराम की नई परिभाषा देते हुए कहते हैं कि सीमित और संयमित गोलीबारी युद्धविराम ही है। कमोबेश बमबारी, मिसाइलों की बौछार और विनाशक हमले तो बंद हैं। अमरीकी राष्ट्रपति किन 21 दिनों की बात कर रहे हैं? 8 अप्रैल से तो कथित युद्धविराम है। अब शांति-समझौता करना चाहते हैं अथवा युद्ध आगे भी जारी रह सकता है? दूसरी तरफ ईरान के आईआरजीसी ने कुवैत और बहरीन के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर हमले कर तबाही मचा दी है। इन्हें अमरीकी सैन्य ठिकाने भी माना जाता है। कुवैत हवाई अड्डे का टर्मिनल-1 तो विनष्ट हो गया। वहां एक भारतीय (उज्जैन निवासी) मारा गया और 13 घायल हुए हैं। अन्य घायलों का आंकड़ा बहुत ज्यादा है। ईरान ने एक ही रात में चार देशों पर हमले कर अमरीकी पक्ष को थर्रा दिया है। ईरानी नौसेना ने ओमान खाड़ी में अमरीकी युद्धपोत पर हमला कर उसे क्षतिग्रस्त किया है। अमरीका के कान खड़े हो गए होंगे! युद्ध के सायरन बजने लगे हैं। लड़ाकू विमान आसमान में मंडराने, गरजने लगे हैं। राष्ट्रपति टं्रप एक तरफ समझौते को लेकर उम्मीद जताते हैं, तो दूसरी तरफ तबाही की धमकियां देते हैं! यह युद्धविराम कैसा है अथवा ईरान युद्ध का दूसरा चरण शुरू हो चुका है? इसी बीच अमरीकी कांग्रेस (संसद) की प्रतिनिधि सभा ने प्रस्ताव पारित किया है कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान रोका जाए और सैनिकों की वापसी शुरू की जाए। प्रस्ताव में यह निर्देश भी है कि यदि भविष्य में युद्ध की कार्रवाई अपरिहार्य हो, तो पहले कांग्रेस (संसद) की मंजूरी ली जाए। प्रस्ताव के पक्ष में 215 और उसके खिलाफ 208 वोट आए। राष्ट्रपति टं्रप की रिपब्लिकन पार्टी के 4 सांसदों ने भी क्रॉस वोटिंग की और डेमोक्रेट्स का समर्थन किया। इससे पहले सीनेट में भी टं्रप-समर्थक सांसदों ने उनके खिलाफ वोट दिए थे। संसद में पारित प्रस्ताव के जरिए राष्ट्रपति की निरंकुश युद्ध-शक्तियों को भी सीमित किया गया है। यह घटनाक्रम और परिदृश्य राष्ट्रपति टं्रप के लिए राजनीतिक और संसदीय आघात से कम नहीं है। फिर भी राष्ट्रपति टं्रप पारित प्रस्ताव को ‘असंवैधानिक’ करार देते हुए ‘वीटो’ कर सकते हैं, लेकिन वह राष्ट्रपति और संसद के बीच टकराव की नौबत से बचना चाहेंगे।
यदि अमरीकी संसद राष्ट्रपति की ‘वीटो’ को बेअसर करना चाहेगी, तो 290 सांसदों को प्रस्ताव के पक्ष में वोट करना होगा। वह ‘महाभियोग’ सरीखी स्थिति ही होगी, लिहाजा हमें असंभव लगती है। बहरहाल ‘वॉल स्ट्रीट जरनल’ जैसे विख्यात अखबार ने यह खबर छापी है कि ईरान के संदर्भ में युद्धविराम कभी भी टूट सकता है! युद्धविराम है ही कहां? तब राष्ट्रपति टं्रप सेनाओं को हमलों की इजाजत भी दे सकते हैं। टं्रप बेहद असमंजस में हैं, क्योंकि उन्हें युद्ध खत्म करने का संसदीय आदेश मिला है, वह खुद भी युद्ध के बाहर आने को आतुर, व्याकुल हैं, लेकिन परिस्थितियां उनके खिलाफ हैं। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ‘मूडीज’ का नया आकलन है कि यदि एक सप्ताह में युद्ध नहीं रोका गया, तो उसके भयावह नतीजे होंगे। अमरीका में ही ‘आर्थिक मंदी’ फैल सकती है। युद्ध के कारण तेल-गैस की कीमतें 4-5 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं, नतीजतन उत्पादन और परिवहन की लागत बढ़ गई है। मुद्रास्फीति का स्तर करीब 4.2 फीसदी तक बढ़ चुका है, जो अमरीका में अभूतपूर्व, अप्रत्याशित है। अमरीका ही नहीं, यूरोप में उर्वरक के दाम 70 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। उससे भारत भी अछूता नहीं है, लिहाजा किसानों को सलाह दी जा रही है कि कम खाद का इस्तेमाल करें। भारत सरकार को खाद, उर्वरकों पर ही करीब 2 लाख करोड़ रुपए की सबसिडी देनी पड़ रही है। बताया जा रहा है कि शनिवार-रविवार को कोई बड़ी खबर सामने आ सकती है। वह युद्ध समाप्ति की शुरुआत की खबर होनी चाहिए, क्योंकि ईरान युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिला कर रख दी है। खाद्य और ऊर्जा के संकट इतने विकराल होते जा रहे हैं कि अकाल और भुखमरी की नौबत सामने दिखाई देने लगी है। विश्व में स्थायी शांति की जरूरत है। युद्धों से किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता। समस्याओं को सुलझाने के लिए बेहतर तरीका बातचीत यानी संवाद ही है। दोनों पक्षों को मिल बैठकर हर मसले को बातचीत से सुलझाना चाहिए। विश्व के सक्षम देशों को आगे आकर मध्यस्थता करनी चाहिए तथा दोनों पक्षों को युद्ध खत्म करने के लिए राजी करवाना चाहिए। ट्रंप अगर शांति का नोबेल चाहते हैं, तो उन्हें संवाद के गहन अर्थ भी समझ लेने चाहिए।

