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    लेख-आलेख

    भारत की विकास गाथा के केंद्र में महिलाएँ-श्रीमती विजया रहाटकर

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inApril 7, 2026
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    भारत की विकास गाथा को अक्सर संख्याओं, विकास दरों, अवसंरचना विस्तार और आर्थिक उपलब्धियों के रूप में व्यक्त किया जाता है। लेकिन, पिछले दशक का सबसे बड़ा बदलाव आँकड़ों से परे है। यह एक गहरे सामाजिक बदलाव में परिलक्षित होता है—महिलाओं का केवल भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को आकार देने वाले अग्रिम व्यक्तियों के रूप में उभरना।
    महिलाओं के नेतृत्व में विकास की ओर यह बदलाव न तो आकस्मिक है और न ही अलग-थलग है। यह एक सोच-समझकर किये गये सतत प्रयास का परिणाम है, जो जीवन के हर चरण में महिलाओं को समर्थन देने के लिए एक सक्षम इकोसिस्टम का निर्माण करता है। लड़की के जन्म से लेकर उद्यमी, पेशेवर, या सार्वजनिक प्रतिनिधि के रूप में उसकी यात्रा तक, यह दृष्टिकोण समग्र, सतत और परिवर्तनकारी रहा है।
    राजनीतिक भागीदारी में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा गया है। निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की संख्या 12,14,885 है, जिनकी कुल 24,41,781 निर्वाचित प्रतिनिधियों में हिस्सेदारी 49.75% है—इस प्रकार, महिलाएँ जमीनी स्तर पर शासन में सक्रिय रूप से भाग ले रही हैं। इस क्रम में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी उपलब्धि है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण की व्यवस्था की गयी है। यह उच्च विधायी क्षेत्रों में महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने में राष्ट्र की अडिग प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। इस ऐतिहासिक सुधार की वास्तविक क्षमता केवल इसके प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से ही हासिल की जा सकती है। अधिनियम की प्रावधानों को जल्द से जल्द लागू करने की आवश्यकता है, ताकि महिलाओं की आवाज़ को सिर्फ मान्यता ही न मिले, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संरचना में इसे संस्थागत रूप से समाहित किया जा सके। इसके जल्द लागू होने से न केवल समावेशी शासन को गति मिलेगी, बल्कि यह बेहतर प्रतिनिधित्व और न्यायसंगत राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक के रूप में भी कार्य करेगा।
    दशकों तक, लैंगिक पक्षपात ने भारत के जनसांख्यिकीय और सामाजिक संकेतकों को प्रभावित किया। आज, वह कहानी धीरे-धीरे फिर से लिखी जा रही है। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहलों ने गहरी जड़ें जमा चुकी मानसिकताओं को चुनौती देने और लड़की के मूल्य को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। इसका प्रभाव राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) में दिखाई देता है, जिसमें 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाओं का लैंगिक अनुपात दर्ज किया गया है, जो सिर्फ संख्यात्मक सुधार ही नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का भी संकेत देता है। ‘मिशन इंद्रधनुष’ जैसे कार्यक्रम जीवन के प्रारंभिक चरण में पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करते हैं। ‘मिशन सक्षम आंगनवाड़ी’, ‘पोषण 2.0’, तथा ‘पोषण अभियान’ के प्रयास कुपोषण का समाधान करते हैं—यह मानते हुए कि स्वस्थ बचपन, सशक्त वयस्कता की ओर पहला कदम होता है।
    माताओं के लिए, संस्थागत समर्थन में काफी विस्तार हुआ है। पीएमएमवीवाई के तहत, 4.28 करोड़ से अधिक महिलाओं को 20,149 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि वितरित की गयी है, जो गर्भावस्था के दौरान वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
    महिलाएं केवल भाग ही नहीं ले रही हैं—वे नेतृत्व भी कर रही हैं। भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में संस्थापक और निर्णयकर्ताओं के रूप में महिलाओं की भूमिका में लगातार वृद्धि हो रही है और वे नवाचार और उद्यम में भी योगदान दे रही हैं। इस परिवर्तन में वित्तीय समावेश ने अहम भूमिका निभाई है। पीएमएमवाई के तहत, 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 57.79 करोड़ ऋण प्रदान किए गए हैं, जिनमें लगभग 66% लाभार्थी महिलाएं हैं। प्रत्येक ऋण केवल वित्तीय सहायता का ही नहीं, बल्कि महिलाओं की आकांक्षाओं में विश्वास का भी प्रतीक है। इसके पूरक रूप में, जन धन योजना के तहत वित्तीय समावेश और गहरा हुआ है, जिसके अंतर्गत 57.93 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं, जिनमें से 32.29 करोड़ (55.7%) महिलाओं के हैं।
    जमीनी स्तर पर, परिवर्तन का पैमाना और भी अधिक प्रभावशाली है। लगभग 10 करोड़ महिलाओं को 90 लाख से अधिक स्वयं-सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जिससे सामूहिक सहनशीलता, वित्तीय स्वतंत्रता और सामाजिक आत्मविश्वास को बढ़ावा मिला है। इस इकोसिस्टम ने 3 करोड़ से अधिक महिलाओं को लखपति दीदी के रूप में उभरने में सक्षम बनाया है और स्वयं सहायता समूहों को 12.50 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बैंक ऋण प्राप्त हुआ है। इसके अलावा, 84 लाख ग्रामीण महिलाएं उद्यमी बन चुकी हैं, जबकि 5 करोड़ महिला किसानों ने उन्नत और सतत कृषि प्रथाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किये हैं।
    स्वाभाविक रूप से अगला सवाल उठता है—क्या सशक्तिकरण, आजीविका से समृद्धि की ओर बढ़ सकता है? लखपति दीदी जैसी पहलों का लक्ष्य आय सृजन को मजबूत करना है, जबकि ड्रोन दीदी पहल, जिसका लक्ष्य 15,000 महिलाओं को ड्रोन पायलट के रूप में प्रशिक्षित करना है, एक दूरदर्शी दृष्टिकोण को परिलक्षित करती है—ग्रामीण महिलाओं को प्रौद्योगिकी-संचालित कृषि इकोसिस्टम में एकीकृत करना।
    सशक्तिकरण का मतलब रोजमर्रा के बोझ को आसान बनाना भी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 10.56 करोड़ से अधिक धुँआ-रहित रसोई घरों ने स्वास्थ्य में सुधार किया है और कठिनाइयों को कम किया है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 11.8 करोड़ से अधिक शौचालयों के निर्माण ने गरिमा और सुरक्षा में वृद्धि की है। प्रधानमंत्री आवास योजना, जिसकी 73% लाभार्थी महिलाएं हैं, के तहत निर्मित घरों ने स्वामित्व और सुरक्षा को मजबूत किया है। साथ मिलकर ये सभी पहलें दैनिक जीवन में गरिमा की परिभाषा को नए सिरे से स्थापित करती हैं।
    इसके साथ ही, महिलाएं उन स्थानों में भी प्रवेश कर रही हैं, जिन्हें कभी उनकी पहुँच से बाहर माना जाता था। सशस्त्र बल इस बदलती हुई वास्तविकता को दर्शाते हैं, जहाँ महिलाएँ नेतृत्व और जिम्मेदारी की भूमिकाएँ निभा रही हैं, जिसमें युद्ध क्षेत्र भी शामिल हैं। सवाल अब यह नहीं है कि महिलाएँ सेवा कर सकती हैं या नहीं, बल्कि यह है कि वे कितनी दूर तक नेतृत्व कर सकती हैं।
    कार्यस्थल सुधारों ने भी इस बदलाव में योगदान दिया है। नयी श्रम संहिताएँ महिला कर्मचारियों को उचित सुरक्षा उपायों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में, जिसमें रात की शिफ्ट भी शामिल है, काम करने में सक्षम बनाकर समावेश को बढ़ावा देती हैं। ये संहिताएँ समान वेतन, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान पर जोर देती हैं—सुरक्षा से सशक्तिकरण की ओर बदलाव को रेखांकित करती हैं।
    संस्थागत समर्थन एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने शिकायत निवारण से आगे बढ़कर सक्रिय जुड़ाव और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में भी अपना विस्तार किया है। ‘शी सर्व्स’ जैसी पहल महिला अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन करती हैं, जबकि ‘यशोदा एआई’ उन्हें उभरते तकनीकी कौशल प्रदान करती है। ‘कैंपस कॉलिंग’ युवाओं में जागरूकता बढ़ाता है, ‘शी इज अ चेंज मेकर’ कार्यक्रम जमीनी स्तर पर नेतृत्व क्षमता को मजबूत करता है और ‘महिला जनसुनवाई’ सुलभ शिकायत निवारण सुनिश्चित करता है।
    जो उभरकर सामने आता है, वह प्रयासों का एक शक्तिशाली समन्वय है, जो महिला-नेतृत्व वाले विकास के नए युग को आकार दे रहा है।

    (लेखिका राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष हैं)

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