Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Trending
    • चैटिंग का ये शॉर्टकट कहीं आपका रिलेशनशिप तो नहीं कर रहा खराब? इस आर्टिकल में जानें क्यों आपका पार्टनर बस हम्म लिखकर हो जाता है चुप
    • तेज प्रताप ने FIR में आकाश के साथ अनुष्का को भी बनाया आरोपी, आवेदन में क्या-क्या लिखा
    • विपक्षी पार्टियों का कांग्रेस में विलय मुश्किल!…
    • भानु सप्तमी पर सूर्य देव से पाएं आरोग्य और धन का वरदान, बस करना होगा ये काम
    • बाल पकड़ के घसीटा, हाथ-पैर बांधकर डंडों से वार… चोरी के शक में आमीन खान ने 8 साल की बच्ची को दी ‘मौत की सजा’
    • सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि पूरे इटली का अपमान हैं , ट्रंप के बयान के बाद इटली ने उठाया सख्त कदम, विदेश मंत्री ने किया दौरा रद्द
    • मोदी सरकार के 12 वर्षों में रोजगार, गरीब कल्याण और अर्थव्यवस्था को मिली नई मजबूती: उद्योग मंत्री श्री लखनलाल देवांगन
    • फिल्म ‘कॉकटेल 2’ ने बॉक्स ऑफिस पर की शानदार ओपनिंग, Fans ने की कृति सेनन के परफॉर्मेंस की तारीफ
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Chhattisgarh RajyaChhattisgarh Rajya
    Sunday, June 21
    • खानपान-सेहत
    • फीचर
    • राशिफल
    • लेख-आलेख
    • व्यापार
    • बिलासपुर
    • रायपुर
    • भिलाई
    • राजनाँदगाँव
    • कोरबा
    Chhattisgarh RajyaChhattisgarh Rajya
    Home»मुख्य समाचार»IIT बॉम्बे का बड़ा इनोवेशन, कचरे से किचन फ्यूल बनाने वाली बनाई मशीन
    मुख्य समाचार

    IIT बॉम्बे का बड़ा इनोवेशन, कचरे से किचन फ्यूल बनाने वाली बनाई मशीन

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inMarch 31, 2026
    Facebook Twitter WhatsApp Email Telegram
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email

    खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव और LPG सप्लाई को लेकर बनती अनिश्चितता के बीच IIT बॉम्बे ने एक ऐसा समाधान पेश किया है, जो न सिर्फ सस्ता है बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहद फायदेमंद है. संस्थान ने सूखे पत्तों और जैविक कचरे से किचन का ईंधन बनाने की पेटेंट तकनीक विकसित की है. करीब 10 साल की रिसर्च के बाद तैयार इस तकनीक ने कैंपस को LPG पर निर्भरता से काफी हद तक आजाद कर दिया है.

    आसान भाषा में समझें तो यह तकनीक ‘कचरे से ऊर्जा’ बनाने का तरीका है. कैंपस में गिरने वाले सूखे पत्ते, टहनियां, लकड़ी के छोटे टुकड़े और भूसा, इन सबको पहले छोटे-छोटे पेलट्स में बदला जाता है.

    इसके बाद इन पेलट्स को एक खास मशीन, यानी बायोमास गैसीफायर में डाला जाता है. यहां इन्हें सीधे जलाया नहीं जाता, बल्कि एक खास प्रक्रिया से गैस और भाप में बदला जाता है. इसी भाप का इस्तेमाल कैंटीन में खाना बनाने के लिए किया जाता है. सीधे शब्दों में कहें तो जो कचरा पहले फेंक दिया जाता था, वही अब किचन का ईंधन बन गया है.

    कैंपस का कचरा अब बन रहा ऊर्जा का स्रोत

    IIT बॉम्बे का कैंपस करीब 550 एकड़ में फैला हुआ है और यहां 50,000 से ज्यादा पेड़-पौधे हैं. हर दिन बड़ी मात्रा में सूखे पत्ते और जैविक कचरा निकलता था, जिसे हटाने में खर्च भी होता था. अब यही कचरा एक संसाधन बन गया है. पहले जहां इसे साफ करने में पैसा लगता था, अब वही कचरा ऊर्जा बनाकर पैसे बचा रहा है.

    इस प्रोजेक्ट की शुरुआत साल 2014 में केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में हुई. उनके साथ डॉ. सुजीत देवरे और डॉ. प्रबोध गडकरी की टीम जुड़ी. शुरुआत आसान नहीं थी. मशीन से ज्यादा धुआं निकलता था, तकनीकी समस्याएं आती थीं और किचन स्टाफ भी इस नए सिस्टम को लेकर थोड़ा डरा हुआ था.

    सबसे बड़ी समस्या क्लिंकर थी, एक ठोस अवशेष जो मशीन को जाम कर देता था. लेकिन टीम ने हार नहीं मानी और लगातार सुधार करते रहे. 2017 में इस समस्या को काफी हद तक हल कर लिया गया.

    बाद में एनर्जी साइंस विभाग के प्रोफेसर संदीप कुमार भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े और उन्होंने बेहतर बर्नर डिजाइन किया. कई सालों तक परीक्षण के बाद 2024 में इसे कैंपस की स्टाफ कैंटीन में सफलतापूर्वक लागू कर दिया गया.

    कितना फायदा मिल रहा है?

    इस तकनीक का असर अब साफ दिखने लगा है. कैंटीन में LPG की खपत 30–40% तक कम हो गई है.  गैस लीकेज या ब्लास्ट जैसी घटनाओं का खतरा लगभग खत्म हो गया है. इससे प्रदूषण भी बेहद कम हो गया है. कचरे के निपटान का खर्च बचा रहा है.  यानि यह तकनीक एक साथ कई समस्याओं का समाधान दे रही है. खर्च भी कम और पर्यावरण भी सुरक्षित.

    पर्यावरण के लिए भी खास

    आज के समय में सबसे बड़ी चिंता प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन है. यह तकनीक दोनों पर असर डालती है. अनुमान है कि इस मॉडल से हर साल करीब 300 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम हो सकता है. साथ ही लगभग 90 टन LPG की बचत भी संभव है. इससे साफ है कि यह सिर्फ एक किचन तकनीक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम है.

    IIT बॉम्बे अब इस तकनीक को सिर्फ कैंटीन तक सीमित नहीं रखना चाहता. योजना है कि इसे हॉस्टल मेस और बड़े किचन तक फैलाया जाए. संस्थान का अनुमान है कि इससे हर साल करीब 50 लाख रुपये की बचत हो सकती है. इस तकनीक का लाइसेंस इनफिक्सेन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया है, जिससे इसे बड़े स्तर पर लागू किया जा सके.

    देश के लिए अहम है यह मॉडल

    आज जब LPG की कीमतें और सप्लाई दोनों अनिश्चित हो रही हैं, ऐसे में यह मॉडल देश के लिए एक मजबूत विकल्प बन सकता है. यह तकनीक दिखाती है कि अगर सही सोच और रिसर्च हो, तो कचरा भी एक बड़ा संसाधन बन सकता है. 

    IIT बॉम्बे का यह “लिविंग लैब” मॉडल अब सिर्फ एक कैंपस तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में शहरों, उद्योगों और बड़े किचन के लिए भी गेम चेंजर साबित हो सकता है. IIT बॉम्बे की यह पहल सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक मजबूत कदम है.

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Email
    chhattisgarhrajya.in
    chhattisgarhrajya.in
    • Website

    Related Posts

    तेज प्रताप ने FIR में आकाश के साथ अनुष्का को भी बनाया आरोपी, आवेदन में क्या-क्या लिखा

    June 20, 2026

    मुख्यमंत्री से छत्तीसगढ़ योग आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष श्री संजय अग्रवाल ने की सौजन्य मुलाकात

    June 19, 2026

    राज्यपाल श्री डेका से सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ की स्टैंडिंग काउंसिल सुश्री जैन ने की सौजन्य भेंट

    June 19, 2026

    Address - Gayatri Nagar, Near Ashirwad Hospital, Danganiya, Raipur C.G.

    Chandra Bhushan Verma
    Owner & Editor
    Mobile - 9826237000 Email - chhattisgarhrajya.in@gmail.com
    Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest
    • About Us
    • Contact Us
    • Privacy Policy
    • Terms and Conditions
    • Disclaimer
    © 2026 ThemeSphere. Designed by ThemeSphere.

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.