रुपया डॉलर के मुकाबले फिर गिरा, 91 के बाद अब कहां पहुंचा?

नई दिल्ली: भारतीय रुपया आज डॉलर के मुकाबले नए ऑल-टाइम लो पर पहुंच गया। इसकी वजह ग्रीनलैंड को लेकर चल रहा विवाद है, जिसने निवेशकों में घबराहट बढ़ा दी है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की निकासी और अमेरिका-भारत के बीच ट्रेड डील में देरी भी रुपये पर दबाव बना रहे हैं। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक रुपया 91.0750 के पिछले रेकॉर्ड को तोड़कर 91.2950 प्रति अमेरिकी डॉलर पर कारोबार कर रहा था। इस महीने रुपया अब तक 1.5% कमजोर हो चुका है जबकि पिछले साल इसमें लगभग 5% गिरावट आई थी।
2025 में रुपये को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, उनमें से कई अभी भी मौजूद हैं। विदेशी निवेशक अभी भी शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। साथ ही, आयातकों को डर है कि रुपया और गिरेगा, इसलिए वे अपनी डॉलर की जरूरत को पहले से ही सुरक्षित कर रहे हैं। इसके अलावा आगे के लिए जो फॉरवर्ड प्रीमियम मिल रहा है, वह रुपये में आने वाली गिरावट की उम्मीदों को पूरा करने के लिए काफी नहीं है।
क्यों गिर रहा है रुपया ?
विश्लेषकों का कहना है कि भारत का करेंट अकाउंट डेफिसिट अभी भी नियंत्रण में है, लेकिन विदेशी पैसा नहीं आ रहा है। यह रुपये को और कमजोर होने से नहीं रोक पा रहा है। एएनजेड बैंक के एफएक्स रणनीतिकार धीरज निम ने कहा, “रुपये की सबसे बड़ी चुनौती पूंजी के मोर्चे पर है। ऐसा लगता है कि आरबीआई कमजोर रुपये को बर्दाश्त करने को तैयार है। अगर दबाव बढ़ता है, तो फिर केंद्रीय बैंक कड़ा रुख अपना सकता है।”
जनवरी में विदेशी निवेशकों ने अब तक लगभग 3 अरब डॉलर निकाले हैं जबकि 2025 में उन्होंने रेकॉर्ड 18.9 अरब डॉलर निकाले थे। इंडिया फॉरेक्स एडवाइजर्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि रुपये का प्रदर्शन घरेलू बुनियादी बातों में किसी भी गिरावट के बजाय मांग और आपूर्ति के संरचनात्मक असंतुलन को दर्शाता है। रुपया कॉर्पोरेट जगत की मांग और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के प्रति संवेदनशील बना रहेगा।
कैपिटल आउटफ्लो
अगर ग्रीनलैंड से जुड़ा तनाव बढ़ता है, तो इससे विदेशी पूंजी का और अधिक आउटफ्लो होगा, जिससे रुपया और कमजोर होगा। मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में पिछले आठ महीनों की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई। विदेशी निवेशकों ने 30 करोड़ डॉलर से अधिक के शेयर बेचे। दूसरी ओर, अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते पर कोई ठोस प्रगति न होने के कारण रुपये को विदेशी पूंजी आने का कोई बड़ा सहारा नहीं मिल पा रहा है।


