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    Home»लेख-आलेख»कृषि क्षेत्र, सूखे की चुनौती
    लेख-आलेख

    कृषि क्षेत्र, सूखे की चुनौती

    chhattisgarhrajya.inBy chhattisgarhrajya.inJune 1, 2026
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    स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ईरान-अमरीका संकट के बीच भारत में अनाज का रिकॉर्ड उत्पादन एक सुरक्षा कवच की तरह है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि 2008 की वैश्विक मंदी में भी भारत की अर्थव्यवस्था खाद्यान्न ताकत के कारण बहुत कम प्रभावित हुई…

    हाल ही में 29 मई को भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने देश की धडक़न माने जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। मौसम विभाग ने साल 2026 के मानसून के अपने पुराने अनुमान को और घटा दिया है। पहले जहां आईएमडी ने लॉन्ग पीरियड एवरेज (एलआरए) की 92 फीसदी बारिश होने का अनुमान लगाया था, वहीं अब इसे घटाकर 90 फीसदी कर दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश में इस साल ‘सामान्य से कम’ बारिश होने की पूरी आशंका है। इस पूर्वानुमान में 4 फीसदी का मॉडल एरर (ऊपर या नीचे) हो सकता है। अगर मौसम विभाग का यह ताजा अनुमान सच साबित होता है, तो भारत पिछले एक दशक के सबसे सूखे मानसून का सामना करेगा। इससे पहले साल 2015 में भारत में इतनी कम बारिश रिकॉर्ड की गई थी, जब मानसून सामान्य से लगभग 13 फीसदी कम था। चूंकि मानसून के दौरान अल-नीनो की स्थिति मजबूत होने की वजह से बारिश कम होगी, अतएव पहले से ही ईरान युद्ध के कारण महंगाई की मार झेल रहे भारत की आर्थिक चुनौतियां बढ़ गई हैं। स्पष्ट है कि अल-नीनो के सक्रिय होने से देश के कई हिस्सों में बारिश पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे फसलों की प्लानिंग और किसानों की कमाई प्रभावित होगी। यदि हम देश में पिछले कमजोर मानसूनों और अलनीनों के प्रभाव का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि सामान्य से कम मानसून वाले वर्षों में जब बारिश का समय, वितरण और फैलाव लगभग समान रहा तब खरीफ के उत्पादन में अधिक कमी नहीं हुई, किन्तु गैर-सिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली दलहन और तिलहन जैसी फसलों के लिए जोखिम हो सकती हैं।

    साथ ही दलहन और तिलहन का कम उत्पादन खाद्य महंगाई पर असर डाल सकता है। एक ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया संघर्ष से महंगे उर्वरक, महंगे तेल और आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने से खेती की लागत बढ़ी है, तब कमजोर मानसून से न केवल किसानों और कृषि पर, वरन आम आदमी और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर हो सकता है। साथ ही पेयजल समस्या की चुनौतियां भी बढ़ सकती हैं। वस्तुत: जलाशयों में पर्याप्त पानी 2025 के मानसून सीजन में अच्छी बारिश के कारण है, लेकिन अब इस साल कमजोर मानसून की आशंका से पानी का संग्रहित स्टॉक जल्दी खत्म हो सकता है। गौरतलब है कि नीति आयोग के मुताबिक देश के कुल फसल रकबे का केवल 55 फीसदी सिंचित है और 45 प्रतिशत खेती मानसून पर निर्भर है। कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स (सीडब्ल्यूएमआई) के अनुसार लगभग 74 प्रतिशत गेहूं और 65 प्रतिशत चावल की खेती वाले क्षेत्र पहले से ही भारी जल संकट का सामना कर रहे हैं। व्यावसायिक फसलों और औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ते रुझान से भारत में मानसून की वर्षा पर निर्भरता बढ़ी हुई है। अब अल-नीनो के खतरे और कमजोर मानसून की आशंका से जलाशय के सूखने और खेती के लिए पानी की कमी की चिंता बढ़ गई है। वास्तव में देश के किसानों और कृषि क्षेत्र की चिंताएं बढ़ाने वाला यह परिदृश्य देश के वर्तमान सुकूनदायक कृषि क्षेत्र के समक्ष एक चुनौती बनकर दिखाई दे रहा है। ऐसे में इस वर्ष सामान्य से कम मानसून और खेती की बढ़ती लागत के मद्देनजर अभी से कई बातों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। इस बात पर ध्यान देना होगा कि कम बारिश से जलाशयों में पानी का स्तर गिरने से सिंचाई और पीने के पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी, ऐसे में अभी से जल संरक्षण के प्रयास शुरू होने चाहिए। चूंकि देश के विभिन्न हिस्सों में विविध जलवायु है और कृषि अनुकूल जलवायु क्षेत्रों के मामले में वह समृद्ध है, अतएव ऐसे में भारत को फसल विविधीकरण और खेती में आधुनिक तकनीक के एकीकरण के साथ आगे बढऩा होगा। चूंकि देश में अभी भी अनाज, दाल तथा तिलहन के उत्पादन का स्तर मौसम पर ही निर्भर होता है, ऐसे में क्षेत्रवार और फसलवार आधार का व्यापक अध्ययन करते हुए सिंचाई व्यवस्था की नई नीति तैयार करना लाभप्रद होगी। हमें कमजोर मानसून और अल नीनो के खतरे के पूर्वानुमान के बीच खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए खाद्य भंडारण को मजबूत करना होगा। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि ईरान-अमरीका संकट के बीच भारत में अनाज का रिकॉर्ड उत्पादन एक सुरक्षा कवच की तरह है।

    यह बात भी महत्वपूर्ण है कि 2008 की वैश्विक मंदी में भी भारत की अर्थव्यवस्था खाद्यान्न ताकत के कारण बहुत कम प्रभावित हुई। इतना ही नहीं छह साल पहले कोरोना से जंग में देश के खाद्यान्न भंडार देश के लिए हथियार बन गए थे। हमें गेहूं के निर्धारित निर्यात आदेशों की पूर्ति के साथ गेहूं के आगामी किसी भी नए निर्यात आदेश की पूर्ति के लिए सजगता रखनी होगी। देश ने देखा है कि वर्ष 2021-22 में 70 लाख टन से अधिक गेहूं का निर्यात किया था, लेकिन वर्ष 2024 में गेहूं का आयात करना पड़ा। ऐसे में अनाज बर्बाद होने से बचाने के लिए देश में वर्ष 2028 तक सहकारी क्षेत्र में 700 लाख टन अनाज भंडारण की नई क्षमता विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना को तेजी से आगे बढ़ाया जाना होगा। चूंकि इस साल खरीफ सीजन की बुआई शुरू होने से पहले ही देश के किसानों और नीति-निर्माताओं की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं और मौसम विभाग के ताजा अनुमानों ने संकेत दिए हैं कि देश के कई हिस्सों में इस बार पिछले 10 सालों का सबसे खराब और सूखा मानसून देखने को मिल सकता है। ऐसे में अल-नीनो के बढ़ते असर को देखते हुए केंद्र सरकार को रणनीतिपूर्वक आगे बढऩा होगा। किसानों को इस बड़े मौसमी संकट से बचाने के लिए सरकार ने 1 जून 2026 से देशव्यापी ‘खेत बचाओ’ अभियान के तहत आगे बढऩे की रणनीति बनाई भी है। इसके तहत किसानों को उनके इलाके और फसल के हिसाब से खास सलाह (क्रॉप-स्पेसिफिक एडवाइजरी) दी जाएगी ताकि वे मौसम के जोखिमों को समझकर सही फैसला ले सकें। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य सिर्फ जानकारी बांटना नहीं है, बल्कि जमीन पर जाकर किसानों को यह बताना है कि उन्हें कम बारिश या सूखे के खतरे वाले इलाकों में कौनसी फसल बोनी चाहिए, किस फसल की तरफ बदलाव करना चाहिए और उनके पास पारंपरिक खेती के क्या बेहतर विकल्प मौजूद हैं। किसानों को उनके इलाके के मौसम, वहां की मिट्टी और बाजार की मांग के हिसाब से व्यावहारिक गाइडेंस दी जाएगी।

    यह बात महत्वपूर्ण है कि इस बड़े संकट से निपटने के लिए सरकार ने एक व्यापक और सहयोगी ढांचा तैयार किया है। इस अभियान में स्थानीय पंचायतों, राज्य सरकारों, कृषि विज्ञान केंद्रों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों और स्थानीय कृषि विभागों को एक साथ जोड़ा गया है। देश के कोने-कोने तक अपनी पहुंच मजबूत करने के लिए 1600 से ज्यादा विशेष टीमें बनाई गई हैं। इनमें से 500 टीमें विशेष रूप से देश के उन 100 जिलों में तैनात की जाएंगी, जहां रासायनिक खादों की खपत सबसे ज्यादा है। इस अभियान के जरिए सरकार अपनी अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी सीधे किसानों तक पहुंचाएगी। टीमें खेतों में जाकर किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड और पीएम-किसान जैसी योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद करेंगी। इसके साथ ही दालों और तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने, ऑयल पाम की खेती, कॉटन मिशन, सॉइल हेल्थ मैनेजमेंट और जल संरक्षण जैसे अभियानों को भी इसी अभियान से जोडक़र जागरूकता फैलाई जाएगी। उम्मीद करें कि सरकार इस वर्ष 2026 में राष्ट्रीय और वैश्विक मौसम अनुमानों में भारत के लिए बताए गए कमजोर मानसून, अलनीनो और कृषि की बढ़ी हुई लागत संबंधी चुनौतियों से निपटेगी।-डा. जयंती लाल भंडारी

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