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लाशों के टुकड़े जोड़ बना ताकतवार इंसान या खतरनाक शैतान

साहित्य की दुनिया में कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो न सिर्फ समय की सीमाओं को लांघ जाती हैं, बल्कि मानव मन की गहराइयों को छूकर हमें खुद से सवाल करने पर मजबूर कर देती हैं. मैरी शेली की ‘फ्रैंकेंस्टाइन (1818)’ ऐसी ही एक कृति है. महज 19 साल की उम्र में लिखा गया यह उपन्यास, विज्ञान कथा का पहला उदाहरण माना जाता है, आज भी प्रासंगिक है. विज्ञान की उन्नति के दौर में, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी तकनीकें हमारी जिंदगी का हिस्सा बन रही हैं, ‘फ्रैंकेंस्टाइन’ हमें बताती है कि सिर्फ किसी चीज का निर्माण कर देना ही काफी नहीं है. उसको लेकर अगर जिम्मेदारी की भावना नहीं होगी तो इस नवनिर्माण के कोई मायने नहीं हैं.

अब इसी उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘फ्रैंकेंस्टाइन’ 7 नवंबर को ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है. ‘फ्रैंकेंस्टाइन’ का निर्देशन गिलर्मो डेल टोरो ने किया है और उन्होंने दिखा दिया है कि वह कहानी कहने की कला में माहिर हैं. उन्होंने जिस तरह से इस फिल्म को पेश किया है, वह इसे 2025 की बेहतरीन फिल्मों की लिस्ट में शुमार करने के लिए काफी है.

‘फ्रैंकेंस्टाइन’ की शुरुआत आर्कटिक के बर्फीली माहौल से होती है, जहां कप्तान रॉबर्ट वाल्टन एक रहस्यमय व्यक्ति विक्टर फ्रैंकेंस्टाइन से मिलता है. विक्टर अपनी जिंदगी की दास्तान सुनाता है. जिनेवा के एक अमीर परिवार में जन्मे विक्टर को बचपन से ही प्रकृति और विज्ञान का जुनून सवार रहता है. लेकिन एक दिन उसकी मां की मौत हो जाती है और उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है.

अब वह मौत से जंग लड़ने का फैसला करता है और फिर वह मृत लोगों के शरीर से एक जीवित प्राणी की रचना करने का फैसला करता है. वो इसमें कामयाब भी होता है, लेकिन विकृत दिखने वाली ये प्राणी को देख विक्टर को लगता है कि उसने कोई भूल कर दी है. इसके बाद की कहानी ही फ्रेंकेस्टाइन को खास बनाती है. इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे विक्टर की ये रचना अकेलेपन और इंसान के तिरस्कार का शिकार होती है. इस कहानी को इस लाइन से समझा जा सकता है, ‘मैं अंधेरे में पैदा हुआ, लेकिन प्रकाश की तलाश में भटकता रहा. खास बात यह कि नेटफ्लिक्स पर ये हिंदी में भी मौजूद है.

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