देश भर में ‘विरोध’ एक असरदार मुहावरा और हथियार बन गया है। इसे सामुदायिक प्रयोग भी कह सकते हैं। लगता है कि कष्ट, अन्याय, शोषण इतनी पराकाष्ठा तक पहुंच चुके हैं कि आखिरी विकल्प ‘विरोध’ ही बचा है। कई बार यह भी एहसास होता है कि ‘विरोध’ की जमात में अचानक महात्मा गांधी की चेतना जागृत हो उठी है और वह व्यवस्था की चूलें हिला देने पर आमादा है। बिल्कुल शांतिपूर्ण, संयमी, इच्छा-शक्ति से भरपूर, व्यवस्था के प्रतिरोध और धमकियों को झेलते हुए ‘विरोध’ किए जा रहे हैं। वे कामयाब होकर अपना मकसद भी हासिल कर रहे हैं। यह जमात दिल्ली के जंतर-मंतर या रामलीला मैदान अथवा किन्हीं ‘कॉकरोचों’ से प्रेरित नहीं है, बल्कि दमन, भ्रष्टाचार और शोषण ने इसे संघर्ष करने को बाध्य किया है। दो उदाहरण अभूतपूर्व और अकल्पनीय लगते हैं। बारिश में भीगती स्कूली छात्राओं ने मुख्य सडक़ अवरुद्ध कर दी, क्योंकि वे स्कूल की नकारा, उपेक्षित व्यवस्थाओं से तंग आ चुकी थीं। न अध्यापक, न सुरक्षित क्लास रूम, न स्वच्छ शौचालय और न ही पोषक दोपहर का भोजन..! इस विरोध-प्रदर्शन ने सरकार और प्रशासन को हिला दिया, संबद्ध अधिकारी एकदम दौड़े चले आए और छात्राओं को आश्वस्त किया। विरोध समाप्त कर दिया गया। दूसरा उदाहरण बाबा अंबेडकर की जन्मस्थली महू (मप्र) के पास का है। झार जिले के निसरपुर में ‘माता शबरी आवासीय कन्या छात्रावास’ में 60 छात्राओं की व्यवस्था थी, लेकिन वहां करीब 150 छात्राओं को ‘भेड़-बकरियों’ की तरह ठूंस कर रहने को विवश किया गया था।
बीते रविवार की देर रात में 9वीं-11वीं कक्षा की 40 छात्राएं खिड़कियों से बाहर कूदीं, नंगे पांव चलती रहीं और पुलिस स्टेशन तक पहुंच गईं। रात के अंधेरे में ही एसडीओ (पुलिस) और तहसीलदार दौड़े चले आए और छात्राओं की शिकायतें सुनीं। छात्रावास की वार्डन और कार्यवाहक प्रिंसिपल को तुरंत प्रभाव से निलंबित किया गया। कमोबेश व्यवस्था को विरोध के सामने झुकना पड़ा। दरअसल ये तमाम ‘विरोध’ दिल्ली, रांची, पटना, लखनऊ, कोलकाता के विभिन्न विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों से भिन्न हैं। इन्हें न तो नौकरी चाहिए, न ही अभी उम्र है और न पेपरलीक या परीक्षा रद्द किए जाने के कारण भविष्य दांव पर है। इनका विरोध बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर है। बहरहाल रांची में अनशन, आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन विरोध, संघर्ष अब भी जारी है। अब वे 1932 नौकरीपेशा चेहरे आंदोलनरत हैं, जिनकी नौकरी छिन रही है। सोरेन सरकार ने 2014 के बाद की तमाम परीक्षाएं रद्द कर दी हैं। परीक्षा रद्द, तो चयन भी रद्द और नतीजतन नौकरी भी खत्म…! यह बड़ी अजीब स्थिति है। अब ये नौजवान अदालत में जाएंगे। बिहार के पटना में करीब 70,000 पदों पर नियुक्तियां की जानी हैं। वैसे सरकार में कुल 1.10 लाख से अधिक पद खाली हैं। विरोध और युवाओं की धमकी के मद्देनजर सरकार ने मात्र चार घंटे में ही 32,388 शिक्षकों की भर्ती और परीक्षा का विज्ञापन अधिसूचित कर दिया। बिहार में साल-दर-साल परीक्षाएं नहीं होतीं। स्नातक की डिग्री भी 5 साल में मिल पाती है। यदि परीक्षा होती है, तो परिणाम लटके रहते हैं।
अराजकता और अव्यवस्था की पराकाष्ठा ऐसी है कि युवाओं की उम्र बढ़ती जा रही है और अब नौकरियां छीनने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल में 2016 में 23,753 शिक्षकों की भर्ती की गई थी। मोटे भ्रष्टाचार के आरोपों के मद्देनजर कलकत्ता उच्च न्यायालय ने वे भर्तियां रद्द कर दीं। सर्वोच्च अदालत ने न केवल उस फैसले को बरकरार रखा, बल्कि आदेश दिया कि जो वेतन लिया गया है, वह ब्याज समेत वापस किया जाए। करीब 8 साल के बाद वे नौकरीपेशा शिक्षक बेरोजगार होने के साथ-साथ कर्जदार भी हो गए। कइयों के परिवार हैं, तो वे कैसे गुजारा करेंगे? यह मानवीय और संवेदनशील सवाल है। आखिर यह कैसी व्यवस्था है? अंतत: चारों तरफ विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन जारी हैं। सरकारें या तो मूकदर्शक बनी हैं अथवा हार कर ऐसे फैसले कर रही हैं, जो सभी पक्षों के लिए न्यायसंगत नहीं हैं। ऐसा लगता है मानो सरकारों के पास नौकरियां ही नहीं हैं! सरकारें लटका, भटका रही हैं। मामले अदालतों में चक्कर काट रहे हैं। अब तो सरकारी नौकरी भी सुरक्षित नहीं रह गई है। क्या इसी तरह भारत ‘विश्व गुरु’ बनना चाहता है? बहरहाल, युवाओं की मांगों को संबोधित करने की जरूरत है। आज के युवा ही कल के सशक्त भारत का निर्माण करेंगे।

