राजनीतिक चिन्तक दीनदयाल उपाध्याय का पुण्य स्मरण

एक राष्ट्र के भीतर अनेक स्टेट भी हो सकती हैं। जैसे हिंदू राष्ट्र के भीतर ही भारत, नेपाल, भूटान, थाईलैंड, श्रीलंका, लाओस, वियतनाम, मंगोलिया, तिब्बत जैसी अनेक स्टेट हैं। इसलिए विस्तृत रूप से इसे जंबूद्वीप राष्ट्र भी कहा जा सकता है। लेकिन क्या एक स्टेट में दूसरे राष्ट्र भाव वाला व्यक्ति रह सकता है…
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्य तिथि 11 फरवरी को देश भर में मनाई गई। उनको स्थान स्थान पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई और उनके दिखाए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया गया। उपाध्याय भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष थे। आज की भारतीय जनता पार्टी जनसंघ का ही अवतार मानी जाती है। लेकिन उनके स्मरण का कारण क्या केवल इतना ही है कि वे उस पार्टी के अध्यक्ष रह चुके थे जो पार्टी आज देश में सत्तारूढ़ है? क्या उनका स्मरण केवल इसलिए किया जाए या किया जाता है कि वे जनसंघ/भाजपा से ताल्लुक रखते थे? मुझे लगता है ऐसा नहीं है। जब तक वे जीवित थे तब तक जनसंघ के ही थे, ऐसा सामान्य रूप से कहा जाता है। लेकिन नश्वर शरीर छोडऩे के बाद वे भारत की उस सनातन परंपरा का हिस्सा हो गए जो मानव जीवन के सुख की कल्पना करती है और उसके रास्ते भी तलाशती है। वे उस राष्ट्र जीवन के आधारों को तलाश रहे थे जिसके कारण भारत भूमि मात्र भूमि न रह कर भारत मां बन जाती है। वे राजनीतिक चिन्तक, दार्शनिक और मनीषी परम्परा से ताल्लुक रखते थे। दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय जनसंघ के लिए दार्शनिक आधार तैयार किया। लेकिन क्या वह आधार केवल जनसंघ के लिए था? उनका यह आधार सभी राजनीतिक दलों के लिए था। यह आधार भारतीय सनातन परम्परा से जुड़ा हुआ था। उनकी इच्छा थी कि हजार साल की विदेशी सल्तनतों से मुक्ति मिली है तो हमें अपने आधारों, जो हमारी प्रकृति और स्वभाव के अनुकूल हैं, को अपनी नीतियों का आधार बनाना चाहिए। अभी हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा भी है कि हमारा चिन्तन, हमारी साधना तो सभी के लिए है।
कोई भी उसका लाभ उठा सकता है। लेकिन भारत के अधिकांश दलों ने विदेशी प्रयोगों, जो उन देशों में भी असफल सिद्ध हो रहे थे जहां उन्होंने जन्म लिया था, को ही स्वतंत्र भारत के प्रशासन और शिक्षा के लिए आधार बनाया। उपाध्याय ने राष्ट्र की पश्चिमी कल्पना को नकारा। पश्चिमी चिन्तकों ने नेशन-स्टेट के सिद्धान्त पर जोर दिया और यूरोप में उसे लागू भी किया। उसके कारण यूरोप लम्बे अरसे से युद्ध भूमि बना रहा। अभी भी किसी न किसी रूप में उस युद्ध स्वरूप के दर्शन यूरोप में होते रहते हैं। लेकिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र की संकल्पना को जीवन्त अवधारणा से जोड़ा। उनका कहना था कि मनुष्य के भीतर आत्मा होती है और यही आत्मा मनुष्य के जड़ शरीर को चेतन बनाती है। यदि वह आत्मा शरीर में से निकल जाए तो मनुष्य मर जाता है। उसके शरीर को तो वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित रखा जा सकता है। लेकिन उस जड़ या मुर्दा शरीर को जिंदा नहीं किया जा सकता। वह ज्यादा से ज्यादा अजायब घर की सम्पत्ति बन सकता है। उपाध्याय कहा करते थे कि इसी प्रकार राष्ट्र के भीतर भी आत्मा होती है। उपाध्याय उसे चिति कहते थे। यही चिति राष्ट्र चेतना कहलाती है। शरीर साकार है, लेकिन आत्मा तो निराकार है। लेकिन शरीर से जब आत्मा निकल जाती है तो वह परमात्मा या परम चेतना का हिस्सा बन जाती है। स्टेट साकार है, लेकिन राष्ट्र निराकार है। राष्ट्र मनुष्य के ह्रदय के भीतर बसता है। स्टेट को अपने अस्तित्व के लिए जमीन चाहिए। यह उसकी लाजिमी शर्त है लेकिन राष्ट्र को अपने अस्तित्व के लिए जमीन नहीं चाहिए। वह बिना जमीन के भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है। इजराइल स्टेट तो सदियों पहले खत्म हो गई थी। उसके नागरिक दुनिया के अनेक देशों में बिखर गए थे। लेकिन इजराइली राष्ट्र भाव या राष्ट्र चेतना समाप्त नहीं हुई। यही कारण है कि शताब्दियों बाद इस राष्ट्र भाव ने इजराइल स्टेट को भी साकार कर दिया। एक राष्ट्र के लिए एक ही स्टेट होनी चाहिए, यह अनिवार्य नहीं है। एक राष्ट्र के भीतर अनेक स्टेट भी हो सकती हैं। जैसे हिंदू राष्ट्र के भीतर ही भारत, नेपाल, भूटान, थाईलैंड, श्रीलंका, लाओस, वियतनाम, मंगोलिया, तिब्बत जैसी अनेक स्टेट हैं। इसलिए विस्तृत रूप से इसे जम्बूद्वीप राष्ट्र भी कहा जा सकता है।
लेकिन क्या एक स्टेट में दूसरे राष्ट्र भाव वाला व्यक्ति रह सकता है? यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। शर्त केवल इतनी ही है कि वह व्यक्ति उस स्टेट के संविधान और उसके नियमों का सही तरीके से पालन करे तो वह यकीनन रह सकता है। उसे उस स्टेट की नागरिकता भी मिल सकती है। लेकिन यदि वह व्यक्ति उस स्टेट के संविधान व नियमों का पालन नहीं करता तो उसकी नागरिकता रद्द की जा सकती है। लेकिन किसी से उसकी राष्ट्रीयता नहीं छीनी जा सकती। किसी दूसरी स्टेट में वहां की नागरिकता के लिए आवेदन करना पड़ता है। लेकिन राष्ट्रीयता आवेदन से नहीं मिलती, वह स्वत: भीतर से अंकुरित होती है। इसलिए सिटीजन और नेशनल के बीच के अन्तर को गहराई से समझना होगा। भारत का कोई व्यक्ति जिसके पुरखे सनातन काल से यहीं रह रहे हैं वह स्वभाविक ही यहां का नागरिक भी है और नेशनल भी। लेकिन यदि वह जाकर अमेरिका में बस जाता है तो वह वहां के विधि विधान के अनुसार वहां का नागरिक बन सकता है। लेकिन वह नेशनल (नेशनल शब्द का कोई उचित हिन्दी शब्द मुझे ध्यान में नहीं आ रहा) भारत का ही रहेगा। क्योंकि जैसा मैंने कहा है, राष्ट्रीयता तो निराकार है। वह न तो छीनी जा सकती है और न ही दी जा सकती है। यही कारण है कि सूरीनाम, गुयाना, फिजी, त्रिनिदाद में सैकड़ों वर्ष पहले गए भारतीय वहां के नागरिक हुए। वहां सांसद बने, मंत्री बने। प्रधानमंत्री भी बने, लेकिन भारत के राष्ट्र भाव से बंधे रहे और आज तक भी बंधे हुए हैं। दरअसल राष्ट्र भाव हर व्यक्ति का धर्म है। इस धर्म की रक्षा करनी पड़ती है। यदि किसी राष्ट्र या राष्ट्र भाव के लोग इस धर्म की रक्षा करते हैं तो धर्म भी उस राष्ट्र की रक्षा करता है। कई बार इसकी रक्षा के लिए आत्म बलिदान तक देना पड़ता है। फिर बहुत से पुराने राष्ट्रों का पतन हो गया और वे समाप्त होकर अब केवल अजायब घरों में ही सुरक्षित हो गए। यूनान, मिस्र, रोम का उदाहरण तो पंडित मोहम्मद इकबाल भी दिया करते थे। लेकिन भारत का राष्ट्र भाव बचा रहा और आज तक अक्षुण्ण है।
ऐसा कैसे हुआ? जबकि भारत के राष्ट्र भाव पर तो हजारों साल से विदेशी हमले होते रहे। इसका कारण स्पष्ट है। भारत में राष्ट्र धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने अपना बलिदान तक दे दिया। इसलिए धर्म ने उनके राष्ट्र की रक्षा की। जिन देशों का उल्लेख पंडित इकबाल ने किया है, वहां के राष्ट्र धर्म पर जब संकट आया तो वहां के लोगों ने उसकी रक्षा नहीं की। बलिदान की बात तो बहुत दूर की बात है। वहां के राजाओं ने सत्ता की रक्षा के लिए अपना राष्ट्र धर्म छोड़ दिया और सहेज कर अजायब घर में रख दिया। लेकिन राष्ट्र चेतना से जुड़ा एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या राष्ट्र धर्म या राष्ट्रीयता व्यक्ति को संकीर्ण और संकुचित बनाती है या उसके मन मस्तिष्क को विस्तार देती है? इसका उत्तर भारत की सनातन ज्ञान परम्परा में छिपा है। भारतीय या हिंदू चेतना में ‘नर से नारायण’ तक पहुंच सकने का प्रावधान है। यानी चेतना के विस्तार से नर ही नारायण बन जाता है। सामी पंथ नारायण को ही गौड कहते हैं। लेकिन वहां व्यक्ति को गौड बनने का रास्ता नहीं है, न ही अनुमति है। यदि नर से नारायण की यात्रा सम्भव है तो राष्ट्र चेतना से विश्व चेतना का मार्ग भी सम्भव है। इसी चेतना से वसुधैव कुटुम्बकम् का मंत्र निकला था। दीनदयाल उपाध्याय इसी आधार पर भारत को अग्रसर करना चाहते थे ताकि भारत विश्व में व्याप्त उन्माद को नियंत्रित कर सके। लेकिन एक बात ध्यान में रखना चाहिए। किसी देश का ज्ञान, उसकी चेतना कितनी भी व्यापक क्यों न हो, उसके रक्षा प्रावधान करना उसकी पहली और अंतिम शर्त है। आज दीनदयाल का स्मरण करते हुए इतना ही।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री



