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अनहोनी जब होनी हो जाए…

उथल -पुथल और शोर-शराबे भरे संसद के बजट सत्र के पहले चरण के दौरान 3 अकल्पनीय घटनाएं हुईं, जिनके चलते यह उच्च कोटि का भावनात्मक राजनीतिक ड्रामा बन गया। प्रश्न उठता है अनहोनी जब होनी हो जाए तब क्या होता है? पहला, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में राष्ट्रपति मुर्मू के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का उत्तर नहीं दिया और जिसका कारण यह बताया गया कि उनके पास विश्वसनीय सूचना थी कि अनेक कांग्रेसी महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट के पास पहुंचकर कुछ अभूतपूर्व घटना कर सकती हैं, हालांकि कांग्रेस ने इस बात का खंडन किया। 

इससे एक विचारणीय प्रश्न उठता है कि क्या प्रधानमंत्री भारत के लोकतंत्र के पावन मंदिर संसद में असुरक्षित हैं? और यदि हैं तो कैसे और क्यों? क्योंकि प्रधानमंत्री को देश में सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त है। इसके अलावा संसद परिसर की सुरक्षा में हाईटैक उपकरण लगे हुए हैं और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल को है, जो सीधे गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। यह एक अत्यंत गंभीर मामला है जिसकी गहन जांच की जानी चाहिए और यदि कोई खामियां हैं तो उन्हें तुरंत दूर किया जाना चाहिए। दूसरा, विपक्ष के 118 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष बिरला को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव की सूचना दी है। उन पर आरोप लगाया गया है कि वह भाजपानीत राजग का पक्ष लेते हैं और सत्र के दौरान विपक्षी सदस्यों को बोलने नहीं देते।

विपक्ष के गुस्से का कारण पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक के बारे में राहुल गांधी को सदन में बोलने की अनुमति न देने को लेकर है। ध्रुवीकरण के इस वातावरण में अध्यक्ष और विपक्ष के बीच लंबे समय से टकराव चल रहा था और संसद के शीतकालीन सत्र का यह टकराव और बढ़ गया जब 8 सांसदों को निलंबित किया गया और ऐसे ही आचरण के लिए भाजपा के सांसदों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई। हालांकि सरकार के पास संख्या बल है और लोक सभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव जब 9 मार्च को बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होगा तो गिर जाएगा। बिरला ने नैतिकता का हवाला देते हुए निर्णय किया कि वे तब तक सदन की कार्रवाई में भाग नहीं लेंगे, जब तक उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर निर्णय नहीं हो जाता। इस स्थिति के लिए कौन दोषी है? भाजपा, जो संसद की कार्रवाई में व्यवधान को लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन का स्वरूप मानती है और अतीत में उसने कई बार ऐसा किया है या लोकसभा अध्यक्ष, जो ऐसा लगता है कि सत्ता पक्ष के हितों की रक्षा करने के लिए उत्सुक हैं या इसका कारण लोकतंत्र का धीरे-धीरे क्षरण होना है, जहां एक ओर अच्छी चर्चाएं और बहस असंभव हो गई है। आज तक अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से लोक सभा के किसी भी अध्यक्ष को पद से नहीं हटाया नहीं गया। 

लोकसभा अध्यक्ष का पद बहुत ही गरिमापूर्ण है और मूलत: वह सदन के सेवक हैं किंतु अब वह धीरे-धीरे उसके स्वामी बनते जा रहे हैं और इसका कारण प्रक्रिया के नियम हैं। इसके अलावा संसद में विधायी कार्य के संचालन के मानक गिर रहे हैं और इन नियमों को स्पष्टत: परिभाषित करने की आवश्यकता है। नि:संदेह अध्यक्ष का पद विरोधाभासी है। वह संसद या राज्य विधानसभा के पार्टी के टिकट पर लड़ता है और उससे अपेक्षा की जाती है कि वह निष्पक्ष होकर कार्य करे, जबकि अगले चुनाव के लिए उसे उसी पार्टी से टिकट लेना पड़ता है। ऐसे में उसका निष्पक्ष होकर सदन की कार्रवाई चलाना शायद एक कठिन कार्य है। तीसरा, भाजपा के सांसद विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध एक प्रमाणिक प्रस्ताव लाए हैं, जिसमें उन्होंने मांग की है कि राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता रद्द की जाए और उन पर चुनाव लडऩे के लिए आजीवन प्रतिबंध लगाया जाए क्योंकि वह एक अर्बन नक्सल हैं और राष्ट्र विरोधी शक्तियों से मिले हुए हैं। इसके अलावा उनके सोरोस फाऊंडेशन, फोर्ड फाऊंडेशन, यू.एस. एड के साथ संबंध हैं और भारत विरोधी गतिविधियों में भाग लेने के लिए उन्होंने अमरीका, थाइलैंड, कंबोडिया और वियतनाम की यात्रा की है। 

इसके अलावा वे बड़ी चालाकी से लोगों की भावनाओं को भड़का रहे हैं, वह निर्वाचन आयोग और उच्चतम न्यायालय के विरुद्ध अप्रमाणिक आरोप लगा रहे हैं और बिना किसी साक्ष्य के सरकार की गरिमा गिरा रहे हैं।  प्रश्न यह उठता है कि क्या सरकार इस प्रस्ताव को मतदान के स्तर तक ले जाने की अनुमति देगी? अतीत में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब ऐसे प्रस्ताव मतदान के चरण तक नहीं पहुंचे। इसका संभावित परिणाम क्या होगा? यदि इस प्रस्ताव पर चर्चा होती है तो यह संसद में एक राजनीतिक चर्चा होगी। अध्यक्ष निर्णय करेगा कि क्या किसी और कदम की आवश्यकता है? फिलहाल ऐसा नहीं लगता है कि राहुल गांधी को कानूनी रूप से तत्काल हटाया जाएगा या उन पर चुनाव लडऩे से प्रतिबंध लगाया जाएगा। कुल मिलाकर अध्यक्ष सदन का, सदन के द्वारा और सदन के लिए होता है। उन्हें स्वयं को न्यायाधीश की भूमिका में रखना और पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिए। 

किसी विशेष विचार का पक्ष लेने या विरोध करने से बचना चाहिए, जिससे सदन के सभी वर्गों में उनकी सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता पर विश्वास बना रहे। सदन में इन तीन अनहोनी घटनाओं ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सौहार्द और विश्वास के टूटने का संकेत दे दिया है और दोनों पक्षों में सुलह की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही। अब इस स्थिति में दोनों पक्षों को इस बारे में विचार करना चाहिए कि यहां से आगे कहां जा सकते हैं।-पूनम आई. कौशिश

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