CG हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: निलंबन अवधि को कर्मचारियों की सेवा अवधि में माना जाएगा शामिल
न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि निलंबन अवधि को ड्यूटी में शामिल किया जाएगा। साथ ही, हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा में अनुशासनहीनता किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

मुख्य बिंदु:
- हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का दिया संदर्भ।
- कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय।
- सरकारी सेवा में अनुशासनहीनता के प्रति सख्त रुख अपनाया जाएगा।
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। रायगढ़ वन मंडल में कार्यरत वनपाल दिनेश सिंह राजपूत की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने राज्य शासन के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें उनकी निलंबन अवधि को ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना गया था और उनके वेतन से शत-प्रतिशत रिकवरी का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट का फैसला और उसका आधार
न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि निलंबन की अवधि को ड्यूटी में ही गिना जाएगा। उन्होंने इस फैसले में यह भी उल्लेख किया कि इसी तरह की स्थिति वाले अन्य कर्मचारियों की निलंबन अवधि को ड्यूटी में जोड़ा गया था, लेकिन याचिकाकर्ता के साथ भेदभाव किया गया।

मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता दिनेश सिंह 2 जनवरी 2015 से 2 जुलाई 2019 तक एतमानगर रेंज के पोंडी सब-रेंज में कार्यरत थे। 2 जुलाई 2019 को तथ्यों को छिपाने और गुमराह करने के आरोप में उन्हें निलंबित कर दिया गया था। बाद में, 8 मई 2020 को उनका निलंबन निरस्त कर दिया गया, लेकिन विभागीय जांच लंबित रहने के दौरान उन्हें कटघोरा रेंज कार्यालय में विशेष ड्यूटी पर तैनात कर दिया गया। इस दौरान 312 दिनों (10 महीने 7 दिन) तक वे निलंबन में रहे।
विभागीय जांच में आंशिक दोषी पाए जाने के बाद उनके वेतन से ₹17,467 की वसूली और तीन वेतन वृद्धि रोकने का आदेश दिया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि अन्य कर्मचारियों पर भी समान आरोप लगे थे, लेकिन उनकी निलंबन अवधि को ड्यूटी में जोड़ा गया, जबकि उनके मामले में ऐसा नहीं किया गया।
हाई कोर्ट का निर्देश और प्रभाव
हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने राज्य शासन के आदेश को खारिज करते हुए निलंबन अवधि को ड्यूटी में शामिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अन्य कर्मचारियों की निलंबन अवधि को ड्यूटी में जोड़ा गया है, तो याचिकाकर्ता के साथ भेदभाव क्यों किया गया? सुप्रीम कोर्ट के समानता के सिद्धांत का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि समान परिस्थितियों में सभी कर्मचारियों को समान अधिकार मिलने चाहिए।
सरकारी सेवा में अनुशासन अनिवार्य: बर्खास्तगी सही
एक अन्य मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जनजातीय कल्याण विभाग के दैनिक वेतनभोगी चौकीदार की सेवा समाप्ति को सही ठहराया और स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा में अनुशासनहीनता को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
यह मामला दुर्ग जिले के पोस्ट मैट्रिक आदिवासी छात्रावास में कार्यरत वर्क-चार्ज कर्मचारी दीपक जोशी से जुड़ा है। 2017 में उन्हें अनुशासनहीनता और छात्रों के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों के चलते बर्खास्त कर दिया गया था। दीपक जोशी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी बर्खास्तगी को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का दावा था कि उन्हें विभागीय जांच में उचित अवसर नहीं दिया गया और आरोपों का खंडन करने के लिए जरूरी दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं कराए गए। हालांकि, न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर दिए गए थे, लेकिन उन्होंने अपनी सफाई नहीं दी।
फैसले का व्यापक असर
इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि सरकारी सेवाओं में अनुशासनहीनता और कर्तव्यहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकारी कर्मचारियों को अपनी जिम्मेदारियों का पालन करना होगा, अन्यथा उन्हें कड़ी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। हाई कोर्ट के इस फैसले ने सरकारी विभागों में अनुशासन और कार्य नैतिकता को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण पेश किया है।



