चेन्नई : मद्रास हाई कोर्ट ने सीएम सी. जोसेफ विजय के खिलाफ टिप्पणी करने वाली डीएमके पार्षद डी. सुधा को अग्रिम जमानत दे दी है। हाई कोर्ट ने चेन्नई पुलिस को नसीहत देते हुए कहा कि लोकतंत्र में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को यह मानकर चलना चाहिए कि उनकी आलोचना होगी, उनका मजाक उड़ाया जाएगा और कई बार उन्हें अपशब्द भी सुनने पड़ सकते हैं। इसके लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए।
सीएम विजय पर टिप्पणी से जुड़ा है मामला
डीएमके नेता डी. सुधा ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन के वॉर्ड 95 की पार्षद हैं। वह डीएमके की महिला विंग की पदाधिकारी भी हैं। बीते 8 अक्टूबर को डी. सुधा ने सीएम विजय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। पार्टी के कार्यक्रम में उन्होंने सीएम के लिए कुत्ता और मुर्दा जैसे शब्द बोले थे। टीवीके ने उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने बीएनएस की धारा 296(b), 352 और 353(1)(c) के तहत एफआईआर दर्ज कर ली। इन धाराओं में दोषी पाए जाने पर 3 साल की कैद की सजा हो सकती है। पार्षद सुधा ने अग्रिम जमानत के लिए मद्रास हाई कोर्ट में याचिका लगाई। सोमवार को जस्टिस एन. रमेश ने 25 हजार के मुचलके पर उन्हें जमानत दे दी।
गिरफ्तारी की धमकी का इस्तेमाल गलत
16 पन्नों के जमानत आदेश में जस्टिस एन. रमेश ने कड़ी टिप्पणी की। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की संवैधानिक सुरक्षा की असली इम्तिहान तब होता है, जब कही गई बात तीखी या अप्रिय हो। सत्ता में बैठे लोग कभी भी ऐसे आलोचकों को गिरफ्तार करने का मन नहीं बनाते, जो मर्यादित तरीके से आलोचना करते हैं। बड़े सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को आलोचना, मजाक और अपशब्दों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी राजनीतिक बयान से हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था नहीं फैलती है, तो पुलिस उसे दबाने के लिए गिरफ्तारी की धमकी का इस्तेमाल नहीं कर सकती।
नसीहत, राज्य की सेवा के लिए है पुलिस
डी. सुधा की अग्रिम जमानत पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि उनका बयान एक विरोधी राजनीतिक दल के नेता के तौर पर दिया गया। यह किसी जाति या वर्ग के खिलाफ नहीं था। कोर्ट ने चेन्नई पुलिस से पूछा कि उसने एफआईआर दर्ज करने से पहले शुरुआती जांच या पूछताछ क्यों नहीं की। जस्टिस एन. रमेश ने कहा कि यह मामला सीएम के कथित मानहानि से जुड़ा है। ऐसे सरकारी पदों पर बैठे लोगों की मानहानि के मामले की एक अलग प्रक्रिया है, जिसमें पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की ओर से शिकायत दर्ज कराई जाती है और सरकार से पूर्व अनुमति लेनी होती है। जस्टिस रमेश ने कहा कि पुलिस राज्य की सेवा करती है, जो हमेशा कायम रहता है, न कि सत्ताधारी पार्टी की, जो बदलती रहती है।

