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उत्पादन, परिवर्तन और विविधीकरण: भारत ने किस प्रकार अपनी ऊर्जा प्रणाली को गतिशील बनाया

आर्टिकल-आम तौर पर, संरचनात्मक ऊर्जा परिवर्तन शायद ही कभी आरामदायक समय के दौरान होते हैं। वे तब होते हैं जब किसी संकट की लंबे समय तक अनदेखी की जाती है और उसके प्रति निष्क्रिय भाव रखा जाता है। यद्यपि, पिछले 11 वर्षों के दौरान, मोदी सरकार ने इसके विपरीत काम किया है। इसने ऊर्जा क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन किए, तब भी जब परिस्थितियां प्रतिकूल नहीं थीं। इसने भारत को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधानों को सहन करने के प्रति अधिक क्षमता निर्माण में सक्षम बनाया। मोदी सरकार ने घरेलू उत्पादन का विस्तार करके, नए ऊर्जा स्रोतों में परिवर्तन का प्रबंधन करके और आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाकर, अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बाहरी झटकों का सामना करने में देश को अधिक सक्षम बना दिया है।
भारत के लिए इस समस्या का समाधान करने का मार्ग कभी भी मुश्किल नहीं था। आवश्यकता थी, इसे लगातार आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की। पिछले एक दशक में, मोदी सरकार ने अपनी योजनाओं पर बने रहने का निर्णय लिया। मोदी सरकार ने खुद को आम लोगों के प्रति जवाबदेह बनाया है, जो अपनी समस्याओं का समाधान चाहते थी। इसकी कार्यनीति तीन स्तंभों पर टिकी हुई थी और प्रत्येक ने सरकार से एक अलग तरह की प्रतिबद्धता की मांग की।
पहले कार्यनीति घरेलू उत्पादन की थी। पेट्रोल के साथ इथेनॉल मिलाने की कार्यप्रणाली 2001 में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में आरंभ हुई थी। फिर भी कई वर्षों तक, भारत ने कोई प्रगति नहीं की और इथेनॉल उत्पादन स्थिर रहा। 2014 के बाद ही व्यापक सुधारों की एक श्रृंखला के माध्यम से, भारत इस पहल की पूरी क्षमता का उपयोग करने में सक्षम हुआ। मोदी सरकार के तहत, देश ने ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने, जलवायु परिवर्तन से निपटने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए व्यापक सुधारों की एक श्रृंखला आरंभ की। इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम (ईबीपी) के तहत शुरू में 2030 के लिए पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
हालांकि, 2020 में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीईए) ने इस लक्ष्य को 2025 तक विस्तारित कर दिया, क्योंकि इसने भू-राजनीतिक झटकों की स्थिति में ऊर्जा आयात के प्रति देश की निर्बलता को कम करने के लिए नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया। प्रयासों और नीतिगत फोकस के परिणामस्वरूप, पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग 2014 में 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 20 प्रतिशत हो गया, जो 11 वर्षों में 13 गुना वृद्धि है। इथेनॉल उत्पादन 2014 में 38 करोड़ लीटर से बढ़कर जून 2025 तक 661.1 करोड़ लीटर हो गया।
20 प्रतिशत इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम अब सालाना लगभग 44 मिलियन बैरल कच्चे तेल को विस्थापित करता है।
दूसरी कार्यनीति सही तरीके से ऊर्जा परिवर्तन करने से संबंधित थी। मोदी सरकार ने सभी स्तरों पर देश के इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) उद्योग के विकास का समर्थन किया। इसने ऑटोमोबाइल क्षेत्र में शत-प्रतिशत एफडीआई की अनुमति दी, जिसने पिछले चार वर्षों में एफडीआई में 36 बिलियन डॉलर को आकर्षित किया है। प्रौद्योगिकी नवोन्मेषण को प्रोत्साहित करने और ऑटोमोबाइल विनिर्माण क्षेत्र में आपूर्ति श्रृंखला क्षमता का निर्माण करने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं आरंभ की गईं। भारत में (हाइब्रिड) ईवी का फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग (फेम I) 2015 में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहन प्रौद्योगिकी को अपनाने और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए लॉन्च किया गया था, जिससे इस क्षेत्र का सतत विकास सुनिश्चित हो सके।
योजना के पहले चरण में, लगभग 2.78 लाख ईवी जोड़े गए, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 59 मिलियन लीटर ईंधन की बचत हुई। फेम इंडिया योजना के परिणाम और अनुभव के आधार पर, फेम का दूसरा चरण 2019 में आरंभ किया गया। हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों पर अग्रिम मूल्य में कटौती के माध्यम से उपभोक्ताओं (खरीदारों/अंतिम उपयोगकर्ताओं) को प्रोत्साहन और रियायतें प्रदान की गईं, जिससे इसे व्यापक स्तर पर अपनाने की सुविधा मिली। इस पहल ने इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए अधिक किफायती और सुलभ बना दिया, जिससे उन्हें अपनाने में तेजी लाने में मदद मिली। इस योजना ने 16 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की खरीद और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर सब्सिडी दी, जिससे 42.9 मिलियन लीटर ईंधन की बचत हुई।
इसके अतिरिक्त, इस पहल के परिणामस्वरूप, 2019-20 की तुलना में 2023-24 में भारत में पंजीकृत इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या में 9.7 गुना वृद्धि हुई। वर्तमान में, भारत के ईवी बाजार में 2025-2026 में तेजी देखी जा रही है, जिसकी बिक्री 2.3 मिलियन यूनिट (कुल वाहन पंजीकरण का लगभग 8 प्रतिशत) तक पहुंच गई है।
ईवी और नवीकरणीय ऊर्जा सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन महत्वपूर्ण खनिजों के संबंध में इस परिवर्तन में निर्भरता से जुड़ा जोखिम भी है। खनिज निर्भरता की जगह तेल निर्भरता के लिए बदलाव से पूर्ण ऊर्जा सुरक्षा हासिल नहीं की जा सकती। इस निर्बलता को दूर करने के लिए, मोदी सरकार ने महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को सुरक्षित करने और भारत की महत्वपूर्ण खनिज मूल्य श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करने के लिए ‘राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन’ आरंभ किया।
तीसरी कार्यनीति, मोदी सरकार की ऊर्जा स्रोतों और आपूर्ति भागीदारों के विविधीकरण से जुड़ी थी। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बहु- संयोजन की नीति अपनाई है, जिसने भारत को अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए कई राज्यों के साथ समानांतर, गहरे संबंध विकसित करने में सक्षम बनाया है। इस कूटनीतिक लोकसंपर्क ने भारत के क्रूड सोर्सिंग बेस को एक दशक पहले के 27 देशों से बढ़ाकर आज 40 से अधिक कर दिया है।
इन उपायों के महत्व को समझने का एक उपयोगी तरीका यह विचार करना है कि अगर ये कदम नहीं उठाए गए होते तो स्थिति कैसी दिख सकती थी। रूस-यूक्रेन युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव जैसी घटनाओं ने बार-बार प्रदर्शित किया है कि आपूर्ति श्रृंखलाएं कितनी जल्दी प्रभावित हो सकती हैं। उदाहरण के लिए विचार करें कि इथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे घरेलू विकल्पों के विस्तार के बिना, जिसने 2014 के बाद पहले ही 190 मिलियन बैरल मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल के आयात (और 1.55 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत की है) को प्रतिस्थापित किया है, इस तरह के झटकों के लिए भारत का जोखिम बहुत अधिक और प्रतिकूल परिणाम होता। उस परिदृश्य में (इथेनॉल ब्लेंडिंग को प्राथमिकता नहीं देने की), वैश्विक आपूर्ति व्यवधान भारतीय घरेलू आर्थिक दबाव में बहुत तेजी से परिवर्तित हो गया होता।
अगर मोदी सरकार ने पिछले 11 वर्षों में इन नीतियों को नहीं अपनाया होता, तो इस तरह के व्यवधान भारत की ऊर्जा प्रणाली में गंभीर अस्थिरता पैदा कर सकते थे, जिसके परिणाम भारत जैसी विस्तारित अर्थव्यवस्था के लिए विनाश की सीमा तक पहुंच सकते थे। इसलिए पिछले एक दशक में किए गए सुधारों ने भारत को भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में प्रवेश करने में मदद की है, जिसे हम आज अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के प्रबंधन में मजबूत बफर और अधिक लचीलेपन के साथ देख रहे हैं।
हालांकि, वे दिन जब भारत की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ी और एक ही समुद्री चॉकपॉइंट में स्थितियों के साथ उनमें गिरावट आ गई, अब व्यतीत हो चुके है। अब किसी एक ही गलियारे में कोई भी व्यवधान एक प्रबंधित सोर्सिंग समायोजन को बढ़ावा देता है, न कि आपूर्ति आपातकाल को बढ़ाता है। चूंकि भारतीय रिफाइनरी कम्पनियां एक निर्धारित मूल स्थान से एक निश्चित स्लेट पर निर्भर नहीं करते हैं, इसलिए यह लचीलापन देश के लिए एक प्राथमिक ऊर्जा सुरक्षा संपत्ति है। जहां होर्मुज जलडमरूमध्य एक महत्वपूर्ण चॉकपॉइंट बना हुआ है, भारत जहाजों का मार्ग फिर से बदल सकता है और अपनी रणनीति को अन्य ऊर्जा-निर्यातक देशों की तरफ स्थानांतरित कर सकता है। भारत आज एक दशक पहले की तुलना में वैश्विक ऊर्जा बाजारों में व्यवधानों को संभालने के लिए कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है। एक ऐसी दुनिया में जहां आपूर्ति श्रृंखलाएं तेजी से अनिश्चित होती जा रही हैं, ऊर्जा स्रोतों और साझेदारी का एक व्यापक और अधिक विविध आधार भारत की ऊर्जा आपूर्ति गतिशीलता के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षोपाय बन गया है।
(पत्र सूचना कार्यालय द्वारा जारी)

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