प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने संबोधन में देशहित, समाजहित में चल रहे अनेक कल्याणकारी कार्यों और योजनाओं का जिक्र किया। वहीं विश्व की घटनाओं और आने वाली चुनौतियों का जिक्र भी किया। इसी के साथ उन्होंने नए तकनीकी और डिजिटल युग में नैरेटिव गढऩे के लिए इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग टूल्स को लेकर देशवासियों को सचेत भी किया। इसके लिए उन्होंने ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया, क्योंकि आज की लड़ाई जमीन पर नहीं, दिमाग से लड़ी जाती है।
इस शब्द के विरोध में विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने खुद को दिमागी नक्सली होने पर गर्व महसूस किया। यहां ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ वाली कहावत पूरी तरह फिट बैठती है। ऐसा लगा जैसे यह शब्द, कांग्रेस और उसकी पूर्ववत कार्यशैली का पर्यायवाची है और यह सीधे उन पर कहा गया हो। सच कड़वा होता है। प्रधानमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन जिन्होंने बिना हथियारों के आज तक देश में वैमनस्य, विरोध, जहर और भेदभाव फैलाने का काम किया, उन्हें लगा कि यह उंगली उन्हीं की तरफ उठी है।
शब्दों का खेल और नैरेटिव की राजनीति : देश की राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखने और सत्ता को हर हाल में बचाने के लिए कांग्रेस और उसके नेताओं द्वारा समय-समय पर कुछ शब्द गढ़े गए :
1. समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता : आपातकाल के बाद संविधान की प्रस्तावना में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता, ये तीन शब्द जोड़े गए। आलोचकों का मानना है कि इससे संविधान की मूल भावना को बदलने का प्रयास किया गया, जबकि संविधान की मूल संरचना बदलने का कोई प्रावधान नहीं है। इन शब्दों ने भारत के संविधान की आत्मा को बदलने का पाप किया है।
2. हिंदू आतंकवाद और सैफरन टैरर : कांग्रेस ने सत्ता में बने रहने के लिए हमेशा आतंकवाद और नक्सलवाद को बढ़ावा दिया है। आतंकवाद हिंदुओं के खिलाफ हो तो उसको नजरअंदाज किया। हजारों हिन्दुओं के कत्ल और उनको भगाने का कश्मीर सबसे बड़ा उदाहरण है। उनके शासनकाल में इस्लामिक आतंकवाद की घटनाएं बढ़ीं, जिससे दुनिया में यह धारणा बनी कि विश्व में आतंकवाद कट्टरवाद का परिणाम है। यह नैरेटिव कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को नुकसान पहुंचाने लगा। पाकिस्तान ने भी मुंबई 26/11 हमले में कसाब के हाथ में कलावा और जाली पहचान पत्र से हिन्दू आतंकवाद पर मोहर लगाने की नाकाम कोशिश की थी। पर कसाब के जिंदा पकड़े जाने से सच सामने आ गया।
इसके बावजूद कांग्रेस ने सरकारी रिपोर्टों, हलफनामों, मनगढ़ंत सबूतों, तथा नाजायज तौर पर हिन्दुओं को पकड़ कर उन्हें आतंकवादी के तौर पेश करने का षड्यंत्र किया। ऐसा करके देश में हिंदू आतंकवाद और सैफरन टैरर का नैरेटिव गढऩे की कोशिश की। वोट की राजनीति करते हुए भारत के बहु संख्यक हिन्दू समाज को बदनाम और इस्लामिक आतंकवाद के बराबर खड़ा करने की कोशिश में नाकाम रहे। यह दिमागी नक्सलवाद का ही दूसरा रूप था।
3. भगवाकरण : 2014 में भाजपा सरकार बनने के बाद सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के मंत्र से काम शुरू हुआ। हजारों साल की गुलामी के प्रतीकों को हटाकर देश की मूल संस्कृति और मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास हुआ। देश के महापुरुषों, वीरों और शहीदों का गौरवमयी इतिहास देश के नौजवानों के सामने लाया जाने लगा। इसे रोकने के लिए भगवाकरण शब्द गढ़ा गया, ताकि युवाओं को उनके आत्मबोध से दूर रखा जा सके।
4. गोदी मीडिया : दुनिया में अगर कहीं अभिव्यक्ति की आजादी है तो वह भारत है। एमरजैंसी में भी मीडिया ने हाथ से, ट्रैक्टर से, साइक्लोस्टाइल से सच जनता तक पहुंचाया। सच लिखने की कीमत शहादत के रूप में दी। ‘पंजाब केसरी’ इसका बड़ा उदाहरण है। जब यही मीडिया प्रधानमंत्री मोदी के कार्यों को प्रमुखता से दिखाने लगा तो विपक्ष ने इसे ‘गोदी मीडिया’ कह कर बदनाम किया। यह देश के लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करने की साजिश थी।
चौकीदार चोर, कातिल, मौत का सौदागर, सनातन एक कैंसर, भारत तेरे टुकड़े होंगे, हर घर से अफजल निकलेगा जैसे नारे और विद्यार्थी आंदोलनों में बच्चियों से लगवाए गए अभद्र नारे-इन सबने हर देशभक्त और हर हिंदू के मन को आहत किया है। यही दिमागी नक्सलवाद है। जो लोग बिना बंदूक के देश के दिमाग में जहर घोलते हैं, उन्हीं के लिए प्रधानमंत्री ने यह शब्द इस्तेमाल किया।जय हिन्द जय भारत।-प्रवीण बांसल

